Page 2 - Namami Gange 35th Edition
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सूखी नदी
जब कभी था मुझमें जल
हरे भरे थे मेरे तट
मेरी उच्चश्रृंखल लहरें
छू ती थीृं पादप शाखाएृं
व्रक्षृं की लताओृं पर
पक्कय्षृं का मधुरम कलरव
लम्ी नीरव छाृंव में
जीव्षृं की लीला अक्भनव
ये मेरे यौवन की बातें
आज बनी मेरी यादें
नहीृं बहता अब शीतल नीर
जज्जर हुआ मेरा शरीर
अब कहाँ पक्कय्षृं की परवाज़
कहाँ सजीव्षृं की क्ीड़ा
अब नहीृं कमल के पुष्प यहाँ
नहीृं क्षई मन्षरम पीड़ा
रेत की चृंद लकीरे शेष
शेष है कु छ सूखी लकड़ी
जैसे क्षई अस्थि-पृंजर
अवशेष ह्ष जीवन का।
- प्रवीण कु मार

