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मां गंगा की पावन मिहमा
िहमिग र की नीरव ऊँ चाई से, सनातन की धुरी हो तुम,
जब धरती पर तुम आती हो, धम -च का आधार हो,
लगता है नभ का उिजयारा कालातीत वाह तु ारा,
जल बनकर मु ाता हो॥ अिवनाशी िव ार हो॥
तुम के वल धारा नही ं मां, वैभव देखा, तप भी देखा,
तुम साधना की गित हो, यु -धूल और शांित-राग,
हर लहर तु ारी मं बने, सबको तुमने दय समेटा,
हर बूँद क णा की रित हो॥ क णा बनकर हर अनुराग॥
िनम ल तुम के वल जल ही नही,ं तुम न के वल ास बुझाती,
ि हो िनम ल, पावन हो, मानवता को जगाती हो,
िजसम मानव अपने भीतर जीवन के वल लेना नही—ं
देखे स , िशव, सावन हो॥ देना भी िसखलाती हो॥
अिवरल तुम बहती ही जाओ, हम जब तुमको मिलन कर ,
जीवन का संदेश यही— थका द अपनी भूलो ं से,
कना नही,ं थमना नही,ं तब भी मां तुम बहती रहती,
क ाण-पथ ही शेष सही॥ आशा रखती फू लो ं से॥
तुमम ृितयाँ बहती मां, िनम लता तुम त-सी धरो,
इितहास नही,ं अनुभूित है, अिवरलता मया दा है,
ऋिषयो ं के पदिच बस , तुमम ही भारत की आ ा
जन-जन की ा यु है॥ पाती िनत नव साधना है॥
दीपो ं की उजली कं पन म , जब तक िहम की ास बहेगी,
अ ु-भाषा की गहराई, जब तक ा जीिवत है,
तु ारे तट पर स ता ने तुम बहती रहोगी मां—
अपनी पहली वाणी पाई॥ जब तक यह चेतना त है॥
काशी की सं ा म जब भी तुम तीथ की जीिवत ोित,
आरती की लौ जगती है, तुम जा त िव ास हो,
लगता है ा की ोित जल म ही नही,ं हर दय म
अंबर तक बह चलती है॥ मां तुम हमारा अिमट िव ास हो॥
याग-संगम म मां तुम
समप ण का प धरो,
जहाँ अहं गलकर शांत बने, गौरव िसंह
मन अपने मूल म िफर धरो॥ रा ीय गंगा िमशन

