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गंगा महागाथा - पु  सिलला की अमर कथा






                         हे गंगा! हे पु  सिलला! हे ि भुवन की जीवन-धारा,  तेरी शीतल हवाओ ं म  क णा का मधुर संदेश है,
                              तेरे चरणो ं म  नत है यह स ूण  जगत हमारा।  तेरी   ेक बूंद म  िछपा मानवता का प रवेश है।

                          तू के वल जल की धारा नही,ं तू युगो ं की पहचान है,  तूने सूखी धरती को ह रयाली का वरदान िदया,
                           तेरी हर लहर म  िछपा  आ भारत का स ान है।  तूने जन-जन के  जीवन को नव  ाणो ं का दान िदया।


                       जब अ णोदय की  थम िकरण  नभ के  पट खोलती ह ,   सिदयो ं की धूप सहकर भी तू अिवरल बहती आई है,

                          िण म आभा म  धरती की सोई किलयाँ डोलती ह ।  इितहास के   िण म पृ ो ं पर अपनी छिव बनाई है।
                       तब तेरी िनम ल लहरो ं पर  भात का संगीत उतरता है,  तेरे तट पर स ताओ ं ने अपने दीप जलाए ह ,
                        मानो  यं देवो ं का आशीष धरा के   दय म  भरता है।  तेरे िकनारो ं ने िकतने युगो ं के  गीत सुनाए ह ।


                       तेरे तट पर  खले कमल जब मु राकर भोर सजाते ह ,  िशलाओ ं की खनक तेरी िवजय-गाथा गाती है,

                          मंद पवन के  मधुर  श  से  ेम-गीत गुनगुनाते ह ।  वन-प ो ं की सरगम भी तेरी मिहमा सुनाती है।
                         बांसुरी के   र जब तेरी लहरो ं म  िवलीन हो जाते ह ,   ी  तुझे  िण म आभा से अलंकृ त कर जाता है,
                      तब  कृ ित के  कण-कण म  िद  राग झंकृ त हो जाते ह ।  वषा  ऋतु मोितयो ं की माला तुझ पर बरसाता है।



                      सूय  तुझे  ण  मुकु ट पहनाकर अपनी  ोित लुटाता है,  हे गंगे! तू धम  नही ं के वल, तू सं ृ ित की आ ा है,
                        चं मा अपनी शीतल िकरणो ं से तेरा शीश सजाता है।  तू भारत की चेतना, तू युगो ं की परम मिहमा है।
                          तारो ं की िझलिमल चादर जब नभ म  फै ल जाती है,  तू ममता का सागर है, तू क णा का वरदान है,
                             तेरी अमर गाथा  यं सृि  गाकर दोहराती है।  तू समय के  महासागर म  चमकता अमर िनशान है।



                        हे माँ गंगे! तेरी धारा म  ममता का महासागर बहता है,  जब तक नभ म  सूय  रहेगा, जब तक धरती मु ाएगी,
                           तेरे  श  मा  से जीवन का हर संताप िमटता है।  जब तक मानवता  ेम की  ोित जग म  जलाएगी।
                        जैसे माँ के  आँचल म  िशशु को  ेह अपार िमलता है,  तब तक तेरी पावन गाथा अमर  र म  गाई जाएगी,
                         वैसे ही तेरी गोद म  हर  ाणी को आधार िमलता है।  हे माँ गंगे! तेरी मिहमा युगो-ं युगो ं तक छाई रहेगी।



                                                                                                  नीरज यादव
                                                                                                  रा ीय    गंगा िमशन
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